Tuesday, 12 December 2017

#नौकरी

#घर_नौकरी 

छोड़ आया उन्हें जिन्होंने कभी हमे न अकेला छोड़ा था,
कमाने के बहाने जब हमने घर छोड़ा था।

घर भी अपने अब मोहलत पर जाते है,
आते वक़्त कुछ यादों को और जल्दी वापस आने का वादा कर आते है।


अब तो रूम लेकर रहते है घर छोड़ कर, 
बस लगे है हम भी सबकी तरह कमाई की दौड़ पर।


कभी अपनों की न सुनी आज बोस की हाँ में हाँ  मिलाते है,
कभी माँ पीछे दौड़ती थी खाने को लेकर आज अपने हाथ की जली रोटी खाते है।


Incriment/promotion वाले लोलीपोप के लालच में मशीन हम हो गए,
punctuality के चक्कर में कभी कभी तो खुली आँखों से ही सो गए।


कमाने के चक्कर में दोस्त खर्च होते जा रहे है,
छुटी मांगने जाओ तो बॉस याद दिला देता है के Increment नज़दीक अ रहे है।



नौकरी दो ही शब्दों पर टिकी है yes or sorry बाकि ज़ुबान बंद रखने को ही शायद professionalism कहते है ,कभी कभी तो सोचता हूँ के हमसे जयदा अपनी मर्ज़ी के मालिक वो है जो चाट-मूंगफली के ठेले लगा के बैठे है।

#मनीष पुंडीर

Saturday, 9 December 2017

कड़वी सच्चाई

 #कड़वी_सच्चाई

रंगत इस जमाने की बताऊ क्या, हर रिश्ते में बंदिशे है जताऊ क्या ??



कोई कह कर खुश् है..कोई चुप रह कर, 
किसी को राम नाम में आराम है,
किसी को राधा का दर्ज़ा मिला कोई मीरा बन बदनाम है।


कदर यहाँ अब की है तब का कोई हिसाब रखता नहीं,
गिरगिट तो खाली बैठे है इंसान ही अब रंग बदलने से रुकता नहीं।


आज साथ में हो तो तू ही यार ही कल का किया सब बेकार है,
रिश्तों का क्या कहे अब  नफ़ा-नुकसान का कारोबार है।


रोया तो अकेला था कामयाबी में न जाने भीड़ कहा से आ गयी,
सच्चा था तो किसी ने न पूछा पर बदला तो मेरी मकारी सबको भा गयी।


सच से सबको अब चीड़ है झूठ सुनके सब यहाँ सुकून पाते है,
ग़लती यहाँ सबको नज़र आती है पर खुद को बदलना कोई चाहता नहीं।


#मनीष पुंडीर

Friday, 8 December 2017

जिंदगी_नौकरी

#जिंदगी_नौकरी
आज मंज़िल का पता नहीं पर दुनियादारी की रफ़्तार में दौड़ हम भी रहे है,
रोज़ का सफ़र है राह भी वहीँ है बस रोज़ अहसास ही नये है।

कमाने के चला तो बहुत कुछ गवा बैठा सोने को गया तो ख्यालों ने घेर लिया,
ठोकरे भी खायी चालाकी से भी रूबरू हुवे पर ये मन के कच्चे लालच ने फिर बचपन की ओर मुँह फेर लिया।

दो पन्नों की डिग्री ने हमे पढ़ा-लिखा बता दिया बाकि जिम्मेदारियां का डर हमें थोड़ा काबिल भी बना गया,
फ़िर नौकरी से पाला पड़ा और सब धरा का धरा रह गया कलयुग में कव्वा मोती खयेगा कोई बहुत सही कह गया।

उम्र और समजदारी का एक दूसरे से कोई मेल नहीँ रहा पैसों से आजकल इज़्ज़त तोली जाती हैं,
सुकून अकेले रह कर मिलता हैं वरना तरक़्क़ी पर भीड़ साथ ही आती है।

#मनीष पुंडीर

Monday, 4 December 2017

तलाश

#तलाश
     
कहाँ कहाँ घूम आता है मन कुछ #सुकून पाने की प्यास में, 
ऐसा क्या नहीं हम में जो है उस ख़ास में। 


#उम्मीद का रास्ता मोक्ष तक ले जयेगा ये तो बाद की लड़ाई है,
सफ़र तो ये नासूर है जिसमें इन्तेहाँनो की सीधी चढ़ाई है।


कैसा दौर है क्या दस्तूर है दगा किसी ने की नहीं और सगा कोई रहा नहीं,
 #दुनियादारी भी क्या खूब निभी हमने सबकी कदर की पर किसी ने हमें चाहा नहीं।


सावन भी आया पतझड़ भी लौटा पर मैं उस मोड़ पर आज भी वही ठहरा , 
हिसाब भी लगया नुकसान भी समझा पर क्या करूँ मैं #नासमझ जो ठहरा।


अब समझ ये नही आता है ये एहसास लाश है या #तलाश बेजान सी हो चली मेरी ख्वाइशें, 
बड़ा चंट है मन मेरा मूड अच्छा देखर बदल देता है फरमाइशें।.

#मनीष_पुंडीर

सर्दी की धूप

#सर्दी_कि_धूप 

 


तू सर्दी कि धूप सा छू जा मेरे ठन्डे पड़े एहसासों पर और उन्हें खुशनुमा करदे,
मै भी खिल जाऊ तेरी गर्माहट से जो तू मुझे बाहों में भरले।


गलत सही से परे सोच की उदेढ़ बुन छोड़ कभी मुझे वो पल दे जो किसी अच्छे बुरे के पैमानों से परे हो,
तेरे हसने की वजह...तेरे रूठने का अंदाज़...हो कुछ आदतें जिनपर सिर्फ हक मेरे हो।


किसी दिन रोक दू सारी कायनात जब तू मेरे साथ हो,मेरी आग़ोश में हो तू बेखोफ ऐसी भी एक रात हो...
 जब बातें बेफ़िज़ूल लगे और साँसों में बात हो,सारी शिकायतों का हिसाब हो ऐसी भी एक मुलाकात हो|


इस सर्दी मुकम्ल हो हमारी वो तन्हा काटी ठंड की रातों वाली हसरते......के सुध बाकि न रहे,
इस कदर हो संगम तेरा मेरा के मुझमे खो जाये तू........खुद में तू बाकि न रहे.

 :- मनीष पुंडीर






#नौकरी

#घर_नौकरी  छोड़ आया उन्हें जिन्होंने कभी हमे न अकेला छोड़ा था, कमाने के बहाने जब हमने घर छोड़ा था। घर भी अपने अब मोहलत पर जाते है, ...