Sunday, 9 November 2014

दिल की बात........

कभी कभी दवा  नहीं वक़्त देने की जरूरत है.…

 
       सुरुवात एक किस्से से करूँगा मै श्याम के 4 बजे करीब मेरठ से दिल्ली के लिए बस ले रहा था तो ड्राइवर के पीछे वाली सीट पर बैठ गए कुछ देर बाद मेरी माँ की उम्र की करीब 35-40  के बीच की एक मोहतरमा मेरे बगल में आकर बैठ गयी,उनकी सफ़ेद लाल बाल और पीछे एक जुड़े में कसे हुवे थे मुँह पर उनके एक अजीब सी उदासी थी। उनकी खाली माँग भी शायद उस उदासी की वजह हो ऐसा मेरे दिमाग ने मुझसे कहा,फिर कंडक्टर आया वो भी दिल्ली तक ही जा रही थी।फिर हम लोग मोदीनगर ही पहुंचे थे तो शयद वो थकी हुई थी वो सो गयी और फिर कुछ देर बाद उनका सर मेरे कंधे पर था तभी जैसा की सब लोग वाकिफ है जो बस में सफर करते है एक अचानक मारा गया ब्रेक,उनकी नींद टूटी ब्रेक से उन्हें झटका लगा पर उन्होंने मेरा सहारा लेकर खुद को संभाल लिया। नींद टूटने के बाद वो एक-दो  बार मेरी तरफ देख के चुप हो गयी मुझे लगा शायद में कोई गलती कर रहा हुँ या उन्हें बैठने की जगह कम तो नहीं पड़ रही फिर मैंने ही पूछा आप ठीक है??? उन्होंने कहा हाँ फिर उन्होंने ये कुछ पल रुकर पूछा के कितना टाइम और लगेगा मैंने कहा अभी मोदीनगर पार हो गया है बस डेढ़ घंटे में पहुंच जायंगे अब वो मुझसे बातचीत करने में लग गयी।पहले तो कुछ आम चीज़ो पर हुई के घर में कौन कौन है क्या करते हो,शादी हुई या नहीं और दिल्ली क्यों जा रहे हो सब कुछ बताने के बाद मुझे भी मन हुवे के उनसे थोड़ा उनके बारे में जान सकु।उसके बाद मैंने उनसे पूछना सुरु किया तो जो उन्होंने मुझे बताया उन सब को एक साथ आप तक लिखता हुँ।
                          


                             उन्होंने बताया की उनके परिवार में वो उनके पति और दो बचे थे बड़ी लड़की और छोटा लड़का जब उनका लड़का तीन साल का था तो उनके पति नहीं रहे उसके बाद वो एक हॉस्पिटल में काम करती रही आज भी वो हॉस्पिटल से अपनी शिफ्ट पूरी करके दिल्ली जा रही थी और बच्चों को पालने से लेकर उनकी रोटी,कपड़ा,मकान और पढ़ाई जरूरी जरूरतों के इलवा उन्होंने कोई ख्वाब देखा बच्चों को अच्छी तरह पढ़ा दिया अब उनकी बड़ी बेटी HDFC बैंक में काम करती है और लड़का किसी अच्छी कंपनी में करता है आंटी को उस कंपनी का नाम याद नहीं था,तो मैंने उन्हें बीच में रोकते हुवे कहा के आंटी आप बहुत अच्छे हो और अच्छे लोगो के साथ अच्छा ही होता है फिर मैंने पूछा के दिल्ली क्यों जा रहे हो?? वो फिर उदास होकर बोली  की शादी है तो मैंने कहा के आप उदास मत हो आपको  अलग होने का दुःख है ना तो उन्होंने सर हिला कर कहा बेटा बात वो नहीं मुझे आज दिन में पता लगा के मेरी बेटी की शादी है ये सुनकर अजीब तो लगा पर उसके पीछे की बात जानी भी जरूरी थी फिर उन्होंने कहा वो पहले ये बोलती रही के मेरे दोस्त की शादी है आपको जरूर आना है फिर जब मैंने आने से मेन कर दिया तो बतया के उसकी खुद की शादी है। मैंने बात को संभालने की कोशिश की के आंटी जी आप लड़के से मिले हो उन्होंने कहा फ्रेंड बोल के एक दो बार मिल वाया है वो तो बहुत अछा है पर ऐसे कैसे शादी होती है ना किसी रिश्तेदारों को बुलया ना मुझे कुछ तयारी करने दी पता नहीं कैसे पैसे जोड़ना सुरु कर दिया था उसने कहती माँ अपने हमारे लिए बहुत किया अब आप आप आशीर्वाद देने आ जाना बस ये बोलते बोलते उनकी आँखों में आँसू थे जो भर नहीं आये अब वो खुशी के थे या गम के ये समझ नहीं आया?????.......... 

                     फिर मैंने उनसे उनके लड़के के बारे में पूछा तो उन्होंने गुस्से में कहा के वो नालायक किसी काम का नहीं है ये उनके हस्सी आई पर उस वक़्त वो जगह सही नहीं थी फिर मैंने उन्हें हलकी मुस्कान के साथ कहा ऐसा क्यों कह रहे हो आप तो फिर बोलने लगी जिसमे दर्द महसूस हो रहा था.। वो अपनी दीदी के घर के पास ही किसी लड़की के साथ रहता है दीदी से भी मिलने तब जाता है जब कुछ काम हो,पता नहीं क्या जादू किया है उस कुतिया ने मुझसे मिलने भी नहीं आता और जब में दिल्ली आती हुँ तो नहीं आता फिर कुछ देख खुद को संभाल कर उन्होंने कहा अरे में तो उन दोनों की शादी भी करवा दूंगी मुझे मिवाये तो.…अब यही दोनों है इनकी खुशी में ही मेरी खुशी इनसे लड़कर भी कहा जाउंगी,पर बेटा ऐसे शादी से पहले एक साथ रहना गलत बात है के नहीं ?? मैंने भी सहमति के लिए अपना सर हिलया।अब तो मेरी यही इच्छा है के ये दोनों खुस रहे मेरा क्या है में अपनी हॉस्पिटल की नौकरी से गुजर कर लुंगी तो मैंने कहा के अब वहाँ  नौकरी करने की क्या जरूरत है?? तो उन्होंने कहा के उनपर बोझ नहीं बना चाहती अब.……………ये सुनकर पता नहीं क्यों उनके लड़के पर अंदर से गुस्से जैसा कुछ भाव आया पर में कर भी क्या सकता था फिर जब दिल्ली पहुँचने वाले थे तो उनके ये शब्द मेरे ज़हन में आज भी ताज़ा है "कोई नहीं तू भी मेरा ही बेटा है वो एक नालायक  दिया है तो क्या तुझ जैसा अच्छा बच्चा भी तो है तू ना होता तो सफर इतना अच्छा ना जाता" मेरे दिल में एक सुकून और खुशि की मिलीजुली सी मुस्कान निकली। दिल्ली आ चूका था में पहले उतर के अपनी प्राकृतिक पीड़ा को शांत करने की जगह खोजने लगा,उसके बाद जब में जा रहा था तो वो आंटी एक लड़के को गले लगा कर रो रही थी उनके आँसू बता रहे थे के वो उनका नालायक बेटा है तभी मेरी आँखों से भी एक बून्द पानी निकला और होटों पर पाँव भर मुस्कान भी थी। 

             ये कहानी आपके लिए शायद उतनी खास ना हो या आपतक उस तरीके से ना पहुंचे जिस तरह मैंने वो सब जिया पर में इस कहानी में अपनी भूमिका से खुश हुँ क्युकी परेशानी सबके साथ है खुसी-दुःख की बैलेंस-शीट घटती-बढ़ती रहती है। बाकि हाँ इसके माध्यम से इतनी गुजारिश है के हम किसी को को उसके वर्तमान से नहीं पहचान सकते हर किसी की अपनी एक कहानी है अगर वो जाना चाहते हो तो वक़्त दो,हर किसी को किसी ऐसे की तलाश होती है के जिसे वो अपना दर्द दुःख बाँट सके अब वो आप पर है आप किसी की कहानी में क्या भूमिका निभाना चाहते है?????????????????????


धन्यवाद :-
मनीष पुंडीर 
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