Tuesday, 11 November 2014

"दिल तो बच्चा है जी"

यादों के बक्से से बचपन की बातें............. 
               

                           मारी  जिंदगी तीन शब्दों में बटी है "कल आज और कल" शयद ये समझने की जरूरत नहीं पड़ेगी,पर हमारा बिता हुवा कल गुजर जाने के बाद अहमियत का अहसास कराता है ठीक उसी तरह जब आपकी घर जाने वाली बस आपके सामने से निकले जाये और आप उसके पीछे भागते रह जाये और फिर खुद से कहे के 1 मिनट पहले निकलता तो शायद बस पकड़ लेता। ये बाते में इसलिए कह रहा हुँ क्युकी आज मै  अपनी यादों के बक्से से बचपन की यादों की चादर निकाल रहा हुँ..... हम सब अलग  अलग है चाहे रंग रूप की बात करे या सोच की पर एक बात में पुरे दावे से कह सकता हुँ हम सब जो बड़े हो गए अब बचपन को बड़ा याद करते है और कभी स्कूल ना जाने के बहाने करने वाले उसी स्कूल की जिंदगी को तरसते है। आओे आज बचपन की यादों को ताज़ा करे शायद थोड़ा ही सही कुछ पुराना आपको भी याद आ ही जायेगा  क्युकी "दिल तो बच्चा है जी",तो लिखता हुँ बचपन और स्कूल की मिलीजुली  यादों की बाते अपने ही अंदाज़ में.…………
        

 आज पूरी सैलरी भी वो सुकून नहीं देती,जो बचपन का वो एक रुपया देता था..... 
 आज ऑफिस-कम्पटीशन की ज़द्दोज़हद है वो भी क्या जमाना था जब में बेफिक्र रहता था.। 

आज ऑफ्स के लिए अलार्म लगा के टाइम से उठता हुँ पर तब भी लेट हो जाता हूँ.
कभी क्रिकेट खलने के लिए 5 बजे उठ कर मै ही टीम इकठा किया करता था। 

मिस करता हुँ उस ज़माने को जब हम पीछे बेंच पर बैठे किताबों में क्रिकेट खेला करते थे.… 
और कॉपी के पीछे "FLAMES" उसके नाम के साथ लिख कर दिल को तस्सली दिया करते थे।  

छोटी छोटी आँखों में बड़े बड़े सपने थे,जब विद्या रानी की कसम दी जाती थी.…
एग्जाम की आखरी रात की पढ़ाई और पेरेंट्स टीचर्स मीटिंग के दिन सबकी शामत आती थी।

टीचरों के अलग अलग नाम रखा करते थे,गेम्स पीरियड के बाद लेट पहुँचा करते थे.. 
15  ऑगस्ट पर लड्डू की लाइन में दो-तीन बार लगना,मॉनिटर का ब्लैकबोर्ड पर नाम लिखने पर लड़ना।

on/off  के  स्विच को बीच में अटकाने की कोशिश किया करते थे,जब भीड़ में अकेले होने से डरते थे.. 
मेहमानों  के जाते ही नमकीन के प्लेट पर झपटते थे और माँ मुझे ज़ायदा प्यार करती है इस बात पर बहनो से लड़ते थे। 

खेल-खेल फोड़े मैंने बड़े कॉलोनी की खिड़कियों के कांच पर,अब कैंडी क्रश ही बचा है खेल के नाम पर आज.…
पहले दोस्त उसके पास प्यार का पैगाम ले जाता था,आज व्हट्सऐप और हाईक के स्टिकर्स में ही हो जाता है आधा रोमांस।

वो बात करते पकडे जाने पर क्लास के बाहर खड़ा रहना,वो काम पूरा ना होने पर कॉपी नहीं लाये कहना.... 
आज बर्गर पिज़्ज़ा भी वो मज़ा नहीं देता जो कभी लंच में साथ खाए पराठे और आचार का स्वाद  आता था। 

 wednesday को वाइट शूज ना लाने पर प्रेयर बंक किया करते थे,जब मैग्गी और पार्ले-जी पसंद करते थे.. 
आज एक मैसेज पूरा पढ़ना भारी पड़ता है,तब लइब्रेरी में जाकर पढ़ी  हुई "चंपक" भी अच्छी लगती थी। 

दिवाली में बाथरूम में फूटा मेरा रखा पटाखा,क्लास में मस्ती करते वक़्त मेम से पड़ा चांटा....
हर शरारत पर मेरी  t.c की धमकी देना,हर एग्जाम में मेरा लड़कियों से पेन लेना।

यादों की बारिश में में अपनी बचपन के पन्नों की कश्ती तैरा रहा हुँ,तुम्हे भी शायद कुछ याद दिला रहा हुँ.… 



                      तो यारों ये सब बातें अलग अलग जगह अलग अलग माहोल में सबने जी है मै जितने अच्छे तरीके से बता सकता था वो मैंने आप तक पहुँचा दिया। मेरी गुजरािश है के दिल को बच्चा ही रहने दो क्युकी आप खुद महसूस कर सकते है के जब आप बच्चे थे तब खुस थे या आज खुश है???,सुनने में अटपटा लगेगा पर मेरे  दोस्त वैसे भी कौन सा सुकून है जिंदगी में वक़्त की छड़ी की मार और क़िस्मत की कड़ाई इसी के भरोसे तो सपने पकाने में लगे हो। तो अगर आपके पास भी कुछ खट्टी-मीठी या अटपटी ही क्यों ना हो आप कॉमेंट में लिख सकते है। वो जो "कल आज और कल" वाली बात कही थी आने वाले कल के लिए आज भागता रहेगा तो इतना याद रखना के कल आएगा भी नहीं ये आपको नहीं पता और आज बीत गया तो.………………… कल इसी के लिए तरसोगे !!!!!!!!!!!!


धन्यवाद 
:-मनीष पुंडीर 


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