Wednesday, 8 October 2014

दर्द-ए-दिल

दिल में एक मर्ज़ है जो लाइलाज है 


कैसे बयां करू दर्द-ए-दिल अब लफ्ज़ कागज़ों पर उतरते नहीं........
पहले मिलता था सुकून पर तेरे लिए अब दिल-ओे-दिमाग लड़ते नहीं।

युही लौट आती है तेरी यादें मेरे दिल के फर्श पर जैसे 
सूरज की रौशनी हर सुबह ज़मीं पर पड़ती है.। 

मेरे ज़हन को तेरा ख्याल रूखसत नहीं करता और 
एक तू है जिसे मेरी याद की भी फुर्सत भी नहीं।

उन जगहों में जाकर ख़ुद को यादों में पाता हुँ.…
जहाँ तेरी हस्सी देख खुद की नज़र लग जाने से डरता था मैं। 

कभी ख्यालों से अकेले में जब तेरा ज़िक्र करता है.…
तो ख़ुद से लड़ते लड़ते हार जाता हुँ के आज भी तेरी फ़िक्र करता हुँ। 

प्यार पर भरोसा अपने शयद मेरी ज़िद्द ही थी के.… 
आज अपने इश्क़ को उम्मीद की छड़ी पकड़े देख लड़खड़ाता सा पाता हुँ। 

वक़्त के साथ धुंधलाता सा होता ये अहसास किस के लिए है..... 
कभी खुद से कभी खुदा और कभी अपनी उलझनों से लड़ता हुँ।

हमारी वो साथ बितायी सुकून भरी यादें अक्सर मेरे पास आती है.… 
जब भी अकेला होता हुँ मुझसे कहती आओ तुम्हारी उलझनें बीन दू। 

शिकायत नहीं कोई मुझे तुझसे बस दिल में एक मर्ज़ है जो लाइलाज है.… 
दुखता है जब दुवा में भी दीदार मांगते है और तुम्हे मिलने का वक़्त नही। 

अब मेरी थकी थकी उमीदों को रोज़ तस्सली की नयी खाद देता हुँ.…
मायूसी आती है हर रात हाज़री लगाने में तेरे लौट आने का बता उसे लौटा देता हुँ। 

सबको समझा के बैठा हुँ पर ये दिल एक तमन्ना लिए घूम रहा है.… 
जाने कबसे आंसू बचा रखे है इसने कहता है,तेरे गले लग कर रोयेगा।

बिलखती है साँसे तेरी खूश्बू को पर अब उन्हें में रोक नहीं सकता.... 
फिर सोचता हुँ तू भी मुझे सोचता होगा मेरे लिए तू भी खुद को टटोलता होगा???

:-मनीष पुंडीर 
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