Tuesday, 9 September 2014

माँ या बाप ?????????

हालात मौत मज़बूरी!!!!!

                                                       इस हालत से अच्छा सुकून से मर जाती तो वो ज्यादा अच्छा होता,पापा ने दादा से पूछा के कैसे हुवा ये सब तो दादा ने कहा तेरी माँ सीढ़ियों  से गिर गयी थी..................हम सब एक दूसरे को देखने लगे जैसे किसी को भी दादा की बात पर यकीं ना हुवा हो,पर दादा की बात पर ऊँगली कौन उठाता?? उस वक़्त सबसे बड़ी चिंता थी दादी को किसी तरह बचाना,पापा ने बड़ी एहतियात से दादी का सर उठा कर तकिया रखा उस वक़्त दादी को कोई होश नहीं था तो वो हम में से किसी को भी नहीं पहचान रही थी।तो उनके खून के धब्बे साफ़ करते हुवे पापा ने कहा आराम करने दो इन्हे अभी,उनके चेहरे से पता चल रहा था के उनके मन में बहुत कुछ चल रहा है पर अभी माँ की हालत सुधारना जयदा जरूरी था तो उन्होंने बहन को गर्म पानी करने को कहा और दादी को गोद  में उठाकर बाहर बरामदे में ले गए। 
                                        पानी गर्म होने के बाद पापा ने दादी के सारे बाल काट दिए क्युकी वो चोट  पर लग कर चिपक रहे थे जिसे इन्फेक्शन का खतरा था उन्होंने दादी के जख्मों को बचा कर उन्हें गंजा किया और फिर उन्हें खुद नहलाया,उन्हें खाना खिलाने  की कोशिश की पर उनका मुँह  नहीं खुल रहा था,तब मजबूरन गले में पाइप के सहारे उन्हें पानी और तरल पदार्थ दिए जा रहे थे,फिर वो खून से लथपथ कपड़े बदले अब उनके सर के जख्म साफ़ साफ़ दिख रहे थे मानों  किसी ने कुल्हाड़ी से बार बार वार किया हो। वो देख मेरी रूह तक काँप गयी उस दिन पहली  बार दादी की चोटों  को देख पापा की बायीं आँख से एक आंसू टपकता देखा,दादी की इस हालत को देख कोई भी बता देता की उन पर वार किया गया है पर दादा जी की बात पर यकीं करने के इलवा और कोई रास्ता नहीं था।पापा ने दादी को थोड़ी  देर धुप में बिठया  और बात करने की कोशिश की पर वो एक मूरत की तरह स्थिर थी,जैसे की वो हमारे साथ होकर भी नहीं है वो एहसास  बहुत अजीब भयानक था। 
                                            माँ पापा और हम सब दादी के लिए दुवा कर रहे थे और उनकी पूरी सेवा कर रहे थे,उनकी हालत  में सुधार आ रहा था अब दादी चमच्च से दाल सूप वग़ैरा पि रही थी,उसी रात मुझे भी पहचान कर ईशारे से मुझे अपने पास बुलया और मेरे बालों  पर हाथ फेरने लगी मैंने भी उनका हाथ अपने हाथ में पकड़ के चुम लिया और कहा दादी हम सब यही है आपको कुछ नहीं होगा। उस दिन सब थोड़ा सुकून में थे दादी की तबियत में सुधार देख सबको उमीद थी के अब हम दादी को ठीक कर लेंगे,सब चेन से सोये उस रात पर हमे क्या पता था के वो रात  दादी जी की आखरी रात थी हमारे साथ.………। 
                                               सुबह 5 बजे मेरी आँख खुली दादी को देखने का मन हुवा उनके कमरे में गया पर दादी बड़ी बड़ी खुली आँखे देख एक बार को में डर गया,मैंने माँ-पापा को आवाज़ मारी वो जब कमरे में आये तो पापा ने दादी से बात करने की कोशिश की पर सब बेकार था उनका शारीर अकड़ा हुवा था। माँ फिर उसी सदमे में चिला  कर रोने लगी 6 बजे तक सभी गाँव  वाले हमारे घर में थे,कोई लकड़ियाँ  लेकर आ रहा था तो कोई आकर माँ को समझा रहा था,तीन लोग अर्थी बनाने में लगे थे,मै माँ के बगल में बैठ उनका हाथ पकडे हुवे था वो चुप ही नहीं हो रही थी रोते  जा रही थी पापा एक कोने पर लोगो की बातो पर सर हिला रहे थे पर वो भी शांत  थे और दादा बरामदे में कुर्सी पर अपने हमउम्र लोगो के साथ बैठे कुछ बात कर रहे थे।
                                               8 बजे अर्थी उठी पहली  बार कोई अर्थी बनते देखी थी और सबको रोता देख सोचा मै  नहीं रोऊंगा फिर अर्थी को कंधा देने की बारी आई तो तब मैंने कंधा  दिया तो आँखों में आंसू थे खुद-ब-खुद बहते  गए बहते गए,ये सब मेरे लिए पहली  बार था समशान पहुंचे दादी के शारीर  को जलाया वही उनके लिए पापा ने और मैंने बाल मुंडन(दान) किये।उन पुरे पलों  में एक ही ख्याल आ रहा था के जैसे दादी मुझसे कह रही हो के तुझे देखने के लिए ही जान बचा रखी थी और अचानक वो याद अ गया जब उनका हाथ मेरे बालों था और मैंने उनका हाथ अपने हाथ में पकड़ के चूमा था।फिर दादी की तेहरवीं  और बाकि सारे काम निपटा कर हम सब वापस लौट आये दादा भी साथ में थे।आने के बाद पापा और दादा में कही बार इस बात को लेकर बहस  होती थी के दादी को असल में हुवा क्या था?? दादा हर वक़्त चिला  जाते के तुझे मेरी बातो पर विश्वास नहीं है??
                                                       कैसे कर लेते विश्वास मन मानने को तैयार नहीं था पर फिर भी दादा के इलवा सचाई कोई जनता भी नहीं था,फिर कहते है वक़्त से बड़ा मरहम कोई नहीं है दादी के देहांत को 7 महीने हो चुके थे।पापा भी छुट्टियों पर आये  हुवे थे मै  स्कूल से लौटा  ही था खाना खाने के बाद दादा ने पापा को माँ को और मुझे पास बुलया और अजीब सी बातें  करने लगे की गाँव  में हमारे सारे खेत कहाँ  कहाँ  है किसी को उधार ना ही दिया है और ना किसी से कुछ लिया है.फिर पापा ने एक दम से पूछा माँ को किसने मारा दादा इस बार चिलाये  नहीं वो उसी आवाज़ में बोले जब कोई दर्द से भरा होता है "मैंने मारा तेरी माँ को हाँ मैंने मारा,परेशान  हो गया था उसकी गुलामी करके आते जाते लोगो को पत्थर मरती थी मुझसे सारे  काम करवाती थी.…पागल हो गयी थी वो मैंने मारा उसे और पुलिस में देना है देदो मुझे पर और कोई नहीं था मेरे साथ अकेले मारा मैंने" इतना बोल के वो चुप हो गए,पर ये बात हम भी जानते थे वो अकेले कभी भी दादी को काबू नहीं सकते थे पर दादा ऐसा क्यों कर रहे थे ये तो सिर्फ वहीं  जानते थे। 
                                               दादा जी वैसे तो दाँत  ना होने के कारण  दूध में एक-आधी  रोटी डुबो के खा लेते थे या मैग्गी खाते थे,पर उस वाकये के दो दिन बाद रात में दादा ने 8 रोटिया खायी और सो गए वो रात उनकी आखरी रात थी वो सुबह नहीं उठे और वो राज़ भी उन्ही के साथ सो गया के दादा के साथ दादी पर हमला करने वाला कौन था.…………………आज भी मै  अपने दादा को दोष देता हुँ पर मेरे मन में हमेशा ये रहेगा के सब कुछ पता होने के बाद पापा ने दादी के लिए कुछ नहीं किया या उन्हें अपने बूढ़े  बाप का ख्याल ज्यादा  था??????????????? आपकी नजरों  में उन्होंने किसके साथ सही किया????? माँ या बाप?????????

(आखिर में एक गुजारिश है आप भी अपने ग्रैंडपैरेंट्स और उन सभी लोगो को प्यार,वक़्त और उनके लिए जो खास कर सकते हो करो,क्या पता कल हो न हो?)


:-मनीष पुंडीर 
















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