Wednesday, 24 September 2014

पल पल मरना।

अहसास....... 

                                               ये कोई दिल बहलाने वाली कहानी नहीं है ना कोई कविता और मेरे विचार ये में अपने तीन दोस्तों के लिए लिख रहा हुँ जो मेरे दिल के बहुत करीब है,(पहला मेरा लम्बू,दूसरी मेरी मोटो और तीसरी मेरी छुटकी)ये पढ़ के आपसे सहानुभूति या पैसे की उम्मीद नहीं है बस अगर कुछ दिल को छुवे तो दुवा करना क्युकी सुना है जहाँ दवा काम नहीं करती वहाँ  दुवा काम आती है।हम सब शिकायते करते है हर चीज़ को लेकर खाने से लेकर देश की सरकार तक पर कभी सोचा है एक इंसान ऐसा भी जो 365 दिन 24 घंटे काम करता है और एक दिन की भी छुट्टी नहीं करता बल्कि संडे और त्योहारों  में उसका काम डबल हो जाता है वो ना कभी प्रमोशन के लिए लड़ता है ना कभी काम करने से मना करता है.। मेरी बातों  पर विश्वास नहीं में बात कर रहा हुँ "माँ"की अब जो बातें  कही खुद सोच के देखना क्या कभी आपको माँ ने कहा मै  काम नहीं करूंगी??? 
                          जो भी कहो माँ जैसा कोई नहीं होता उन्हें कभी दुखी मत करना वरना कभी  खुश  नहीं रह पाओगे,माँ अकेली तुम्हारे लिए दुनियाँ से लड़ सकती है आप सोच रहे होंगे में माँ को लेकर इतना सेंटी  क्यों हो रहा है.। मैंने कहा था ना ये तीन दोस्तों के लिए लिख रहा हुँ उन सब में एक चीज़ सम्मान है माँ को खोने का दर्द और डर सुनें में भयानक है पर सच है मेरे तीन दोस्तों में दो लोगों की माँ नहीं है और तीसरी  हालत इस बात से अंदाज़ा लगा सकते हो के जब दिमाग को पता है के ये मुमकिन नहीं और दिल मानें को राजी ना हो.……।अपने  फिल्म आनंद देखी है उन्हीं हालातों  में खुद को रख कर देखो किसी ऐसे को खुद से दूर जाते देखना जिसे आप नहीं जाने देना चाहते पर मज़बूरी के चलते,सिवाए बेबसी से उसे दूर जाते देखना एक बुरे सपनें  से कम नहीं है। 
                                    मैंने तीनों के दर्द को बहुत करीब से देखा है उन्हें अकेले में रोते देखा है,उनकी आदतों  में वो कमी महसूस की है मैंने जैसे पर सिवाए उन्हें समझाने के में भी  चुप हो जाता हुँ।उन्हें हिम्मत देते देते अकेले में उनसे छुप के में भी रो जाता हुँ,पर मुझे दुवा चाहिए मेरी छुट्ट्की की माँ के लिए उन्हें बीमारी है वो आखरी स्टेज पर है मुझको उनका हँसता  चेहरा आज भी याद आता है जब सब उनके घर मस्ती मारा करते थे। पर वो घर दो साल से बंद है जब भी उस गली में जाता हुँ उस घर पर जरूर रुकता हुँ आंटी इलाज के लिए पिछले २ साल से दिल्ली में है.। 
                                         दो साल से मैंने उसके चेहरे पर वो मासूम बेफ़िक्र हस्सी नहीं देखी,शायद उसको भी याद नहीं होगा के आखरी बार पुरे परिवार के साथ कौन सा त्यौहार मनाया होगा। मेरी आखरी बार जब छुटकी से बात हुई थी तब उसने बताया के उनकी बॉडी में खून नहीं रुक रहा हर शुक्रवार उनको नया खून चढ़या जाता है पर हफ्ते के अंत में होमोग्लोबिन ना के बराबर रहता है,पर माँ पहले से जयदा स़्वस़्थ हो रही है बस ऐसे ही उनको जल्दी ठीक करने के लिए दुवा मांगने की आपसे दुवा मांग रहा हुँ। 

:-मनीष पुंडीर 

                        

                      

 """""आज कुछ बताने का मन है मै जितनी भी सच्ची भावुक कहानियाँ  लिखता हुँ ख़ुद  को मजबूत करने के लिए क्युकी ये वो कहानियाँ और बातें है जो अकेले में भी सोच कर मुझे मानसिक रूप से कमज़ोर करते थे पर अब उस डर  को में खत्म करके आपके सामने हुँ  आज.।शायद मेरी ये बात आपको बचकानी लगे पर मेरे ये तीनों  दोस्त मेरे साथ पिछले 10 साल से है जयदा वक़्त से मेरे साथ है मुझे कही न कही लगता है के में उनके साथ जुड़ा हुँ तो कही न कही में इन सब चीजों  का ज़िम्मेदार हुँ।ये मन में हर बार ना चाहते हुवे भी आता है जिससे भी जयदा लगाव रखता हुँ उसके साथ बुरा होता है।बस दिल की बात थी आप तक पहुँचा दी पर दुवा करना माँ के लिए """""



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